मंगलवार, ७ अप्रैल २००९

मीडिया के लिए काला दिन

आज दोपहर १२ बजे नई दिल्ली के २४, अकबर रोड स्थित कांग्रेस ऑफिस में प्रेस कांफ्रेंस में प्रसिद्ध समाचार पत्र के जाने माने संवाददाता श्री जरनैल सिंह ने १९८४ सिख दंगों में सीबीआई द्वारा कांग्रेस के मशहूर नेता श्री जगदीश टाईटलर को क्लीन चीट दिए जाने के मामले पर गृह मंत्री श्री पी चिदम्बरम पर जूता फेंककर सांकेतिक रूप से अपना विरोध जताया।
मीडिया के इतिहास में आज का दिन काला दिन के रूप में याद किया जाएगा मुझे नही लगता कि हम पत्रकारों को इस तरह की ओछी हरकत करनी चाहिए हमारे पास विरोध के और भी विकल्प खुले हैं मगर जो श्री सिंह ने किया वो उनके व्यक्तित्व को बिल्कुल भी शोभा नही देता। हांलांकि श्री सिंह ने कांफेर्रेंस से बाहर जाकर अपनी गलती स्वीकारी और कहा कि उन्होंने विरोध का जो तरीका अपनाया वो ग़लत था मगर उनको अपने विरोध के मुद्दे पर किसी तरह कि कोई शर्म नही है।
एक छात्र पत्रकार होने के नाते मेरा ये मानना है कि एक पत्रकार को धैर्य से काम लेना चाहिए। क्योंकि बिना सहनशीलता के पत्रकारिता नही की जा सकती है और पत्रकारों के पास तो विरोध का सबसे अच्छा विकल्प कलम और कैमरा है।

गुरुवार, २६ मार्च २००९

उसकी याद

उससे कहना कोई आज भी तुम बिन,
हिज्र की झुलसती दोपहरी में सुलगता है,
हब्श्ज़दा रातों में पलकों से सितारे गिनता है,
शाम के उदास लम्हों में दरिया किनारे बैठ कर,
तुम्हें याद करता है,
दरख़्तों पर तुम्हारा नाम लिखता रहता है,
अक्सर हवाओं से तुम्हारी बातें करता है,
तुम्हें लौट आने को कहता है,
कोई तुमसे बिछ्ड़ कर बहुत उदास रह्ता है,
कोई तुमसे बिछ्ड़ कर बहुत उदास रह्ता है.....

बुधवार, २५ मार्च २००९

मेरी कविता

नाज़ है मुझे उस पर जो आज मेरे पास नहीँ,
मगर आज भी उसकी यादेँ मेरे दिल की
वीरान गलियोँ को एक ताज़े फूल की तरह मह्का रही है,
वो मेरे दिल कि धड़कन, मेरे सांसों की ज़रुरत है,
उसके न होने पर भी उसके होने का एहसास है,
वो दूर है मुझ से फिर भी मेरे के दिल पास है,
इसलीए वो मेरी ख़ास है।